Vande Mataram 150 Years: ‘वंदे मातरम’ गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर डीयू में कार्यक्रम आयोजित, प्रधान हुए शामिल
Abhay Pratap Singh | November 10, 2025 | 09:26 PM IST | 3 mins read
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने रामजस कॉलेज में आयोजित वंदे मातरम कार्यक्रम में विद्यार्थियों और दिल्ली विश्वविद्यालय परिवार के साथ ‘स्वदेशी संकल्प शपथ’ भी ली।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय गीत “वंदे मातरम” के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के रामजस कॉलेज में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो योगेश सिंह ने की। कार्यक्रम में डीन ऑफ कॉलेजेज प्रो बलराम पाणी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए।
केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने संबोधन में कहा कि वंदे मातरम का एक-एक शब्द माँ को समर्पित है और माँ कभी सांप्रदायिक नहीं हो सकती। इस अवसर पर धर्मेंद्र प्रधान ने सामूहिक रूप से विद्यार्थियों और समूचे दिल्ली विश्वविद्यालय परिवार के साथ ‘स्वदेशी संकल्प शपथ’ भी ली।
आधिकारिक बयान में कहा गया कि, कार्यक्रम को लेकर जानकारी देते हुए डीयू कुलपति प्रो योगेश सिंह ने बताया कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में साल भर “वंदे मातरम” पर कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। इस दौरान डीयू के सभी कॉलेजों में कार्यक्रम आयोजित होंगे।
150 Years of Vande Mataram - वंदे मातरम चेतना की वाहक है
धर्मेंद्र प्रधान ने संबोधन में कहा कि 150 साल पहले “वंदे मातरम” गीत की रचना की गई थी। भारत के नागरिकों ने एक लंबी लड़ाई के बाद 1947 में देश को आजाद करवाया। ये आजादी एकाएक एक क्षण में नहीं आई, बल्कि अनेक प्रयासों के बाद 1947 में ये परिस्थिति हमें मिली। उस स्थिति में जो मुख्य घटनाएं हुई, उसी दौरान राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने के लिए ऋषि बंकिम चंद्र चटर्जी के द्वारा लिखी गई आनंद मठ की ये कविता “वंदे मातरम” चेतना की वाहक है जिसने देश को एकत्रित किया।
प्रधान ने कहा कि ये “वंदे मातरम” भारतीयों के लिए कालजयी रचना है। काल निर्पक्ष है-काल सापक्ष है। “वंदे मातरम” की जो भावना है और उसमें जो प्रेरणा है वह सभी समय में हमारे लिए प्रासंगिक है। “वंदे मातरम” के गान की आवश्यकता इसलिए पड़ी है, कि दुनिया में भारत देश को एक बार फिर से मजबूत करना है। तब आजादी के लिए हमने “वंदे मातरम” गाया था, इस बार हम एकत्रित होकर समृद्धि के लिए “वंदे मातरम” गा रहे हैं।
आगे कहा, समृद्धि आने से ही विकसित भारत हो पाएगा और उसमें दिल्ली विश्वविद्यालय की एक प्रमुख भूमिका है। भारत में “वंदे मातरम” का पूर्णांग गायन नहीं हो पाया। अब भारत सरकार ने निर्णय किया है कि अब से “वंदे मातरम” का पूर्णांग गायन होगा। इसको जन आंदोलन में परिवर्तित किया जाएगा।
डीयू कुलपति प्रो योगेश सिंह ने कहा कि “वंदे मातरम” 150 वर्ष का हो गया है। ये 150 वर्ष कैसे रहे! ये वर्ष राष्ट्रीय चेतना के वर्ष, बदलते भारत के वर्ष, अंधेरे से उजाले के वर्ष, अंग्रेजों से छुटकारे के वर्ष और भारत के संघर्ष के वर्ष रहे हैं। भारत की इन 150 वर्ष की जो संघर्ष की यात्रा रही है, “वंदे मातरम” उसका उद्घोष रहा है। उसने प्रेरणा का काम किया, जगाने का काम किया और मन को आगे बढ़ाने का काम किया है।
Vande Mataram 150 years - वंदे मातरम राष्ट्र प्रेम की भावना
इस अवसर कुलपति ने कहा, कालजयी गीत को भारत के मनों के नजदीक लाने का काम किया है। “वंदे मातरम” राष्ट्र प्रेम की भावना है और राष्ट्र भक्ति का मंत्र है। कार्यक्रम के दौरान रामजस कॉलेज के प्रिंसिपल प्रो अजय अरोड़ा और वाइस प्रिंसिपल प्रो रुचिका वर्मा सहित अनेकों कॉलेजों के प्रिंसिपल, डीयू के अधिकारी, शिक्षक और अनेकों विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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