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Medical Students Migration: मेडिकल छात्र को दूसरे कॉलेज में स्थानांतरित करने पर प्रतिबंध अवैध - दिल्ली एचसी

Press Trust of India | February 5, 2026 | 04:39 PM IST | 1 min read

यह फैसला एक मेडिकल छात्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया, जो 40 प्रतिशत दृष्टिबाधित है और जिसने बाड़मेर के सरकारी मेडिकल कॉलेज से दिल्ली के एक कॉलेज में स्थानांतरण का अनुरोध किया था।

अदालत ने एनएमसी को याचिकाकर्ता के स्थानांतरण संबंधी अनुरोध पर 3 सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया। (इमेज-आधिकारिक वेबसाइट)
अदालत ने एनएमसी को याचिकाकर्ता के स्थानांतरण संबंधी अनुरोध पर 3 सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया। (इमेज-आधिकारिक वेबसाइट)

नई दिल्ली: एक मेडिकल छात्र के एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में स्थानांतरण या प्रवास पर पूर्ण प्रतिबंध को अमान्य करार देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक फैसले में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को आवश्यक शर्तों को लागू करते हुए स्थानांतरण की अनुमति देने के लिए एक “उचित नीति” तैयार करने का निर्देश दिया है।

मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने कहा कि स्नातक चिकित्सा शिक्षा विनियमन, 2023 का विनियमन 18 संविधान के विरुद्ध है क्योंकि यह “स्पष्ट रूप से अनुचित और मनमाना” है।

यह फैसला एक मेडिकल छात्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया, जो 40 प्रतिशत दृष्टिबाधित है और जिसने बाड़मेर के सरकारी मेडिकल कॉलेज से दिल्ली के एक कॉलेज में स्थानांतरण का अनुरोध किया था। राहत प्रदान करते हुए, अदालत ने एनएमसी को याचिकाकर्ता के स्थानांतरण संबंधी अनुरोध पर तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया।

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अदालत ने 4 फरवरी को दिए गए अपने फैसले में कहा, “हमारा मानना है कि चिकित्सा शिक्षा के मामले में सभी संस्थानों में एकरूपता, मानक और अखंडता बनाए रखने के नाम पर, किसी छात्र के स्थानांतरण या प्रवास पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना, जिसकी आवश्यकता विभिन्न परिस्थितियों में उत्पन्न हो सकती है, जिसमें इस मामले में उत्पन्न हुई स्थिति भी शामिल है, उचित नहीं है। बल्कि, हमारी राय में, ऐसा प्रतिबंध स्पष्ट रूप से अनुचित और मनमाना है।”

पीठ ने पाया कि एनएमसी का यह रुख कि प्रवासन का दुरुपयोग होने की आशंका है, मान्य नहीं हो सकता क्योंकि दुरुपयोग की संभावना का उपयोग किसी नागरिक को वैध अधिकारों से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि संसद द्वारा बनाए गए प्रावधान केवल अलमारी में रखी एक सजावटी और प्रशंसनीय साहित्यिक रचना बनकर नहीं रह सकते।

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