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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को असिस्टेंट टीचरों की नियुक्ति की जांच का दिया निर्देश

Press Trust of India | February 3, 2026 | 11:47 AM IST | 1 min read

हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव (बेसिक शिक्षा) को 6 माह में अवैध नियुक्तियां रद्द करने, वेतन वसूली करने और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए।

हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों से शिक्षा व्यवस्था और छात्रों के हितों को गंभीर नुकसान होता है। (प्रतीकात्मक-विकिमीडिया कॉमन्स)
हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों से शिक्षा व्यवस्था और छात्रों के हितों को गंभीर नुकसान होता है। (प्रतीकात्मक-विकिमीडिया कॉमन्स)

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में जाली प्रमाण पत्रों के आधार पर सहायक अध्यापक के पदों पर नियुक्ति हासिल करने के मामलों का संज्ञान लेते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को ऐसी नियुक्तियों की एक समग्र जांच करने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने राज्य के प्रमुख सचिव (बेसिक शिक्षा) को 6 माह में अवैध नियुक्तियां रद्द करने, वेतन वसूली करने और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए।

गरिमा सिंह नामक एक महिला की रिट याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा निर्देश जारी होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी अवैध नियुक्तियों के खिलाफ समय पर कार्रवाई करने में नाकाम रहे।

जाली प्रमाण पत्रों के आधार पर नौकरी

याचिकाकर्ता ने जाली दस्तावेजों से मिली नियुक्ति रद्द करने के आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की निष्क्रियता से धोखाधड़ी बढ़ती है और शिक्षा प्रणाली और छात्रों के हितों को गंभीर नुकसान पहुंचाती है।

गरिमा सिंह की नियुक्ति देवरिया के बीएसए ने शैक्षणिक और निवास प्रमाण पत्र फर्जी पाए जाने पर रद्द कर दी गई थी। उन्हें जुलाई 2010 में सहायक अध्यापिका के रूप में नियुक्त किया गया था और उन्होंने लगभग 15 वर्ष सेवा दी थी।

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राज्य सरकार के वकील ने कहा कि जिन मामलों जाली दस्तावेजों के आधार पर या तथ्यों को छिपाकर रोजगार हासिल किया जाता है, उन मामलों में लाभार्थी उत्तर प्रदेश सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1999 के तहत जांच की मांग नहीं कर सकता।

अदालत ने 22 जनवरी को अपने निर्णय में फर्जी नियुक्ति के मामलों में मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई करने का भी निर्देश दिया।

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