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Maharashtra Hindi Row: महाराष्ट्र में हिंदी कक्षा 1 से नहीं बल्कि 5वीं से पढ़ाई जानी चाहिए - डिप्टी सीएम पवार

Press Trust of India | June 25, 2025 | 03:48 PM IST | 2 mins read

राज्य सरकार ने पिछले सप्ताह एक संशोधित आदेश जारी किया था जिसमें कहा गया था कि मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पहली से पांचवी कक्षा तक के विद्यार्थियों को हिंदी सामान्यतः तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाई जाएगी।

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को शामिल किए जाने का विरोध किया है। (स्त्रोत-एक्स/@AjitPawarSpeaks)
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को शामिल किए जाने का विरोध किया है। (स्त्रोत-एक्स/@AjitPawarSpeaks)

नई दिल्ली: महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने राज्य के विद्यालयों में कक्षा 1 से तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को शामिल किए जाने के कदम का विरोध किया और कहा कि इसे 5वीं कक्षा से पढ़ाया जाना चाहिए। मंगलवार को मुंबई में पत्रकारों से बात करते हुए पवार ने यह भी कहा कि छात्रों को पहली कक्षा से ही मराठी सीखनी चाहिए ताकि वे इसे अच्छी तरह से पढ़ और लिख सकें।

राज्य सरकार ने पिछले सप्ताह एक संशोधित आदेश जारी किया था जिसमें कहा गया था कि मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पहली से पांचवी कक्षा तक के विद्यार्थियों को हिंदी सामान्यतः तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाई जाएगी, जिसके बाद इस पर विवाद पैदा हो गया।

सरकार ने कहा कि हिंदी अनिवार्य नहीं होगी तथापि उसने हिंदी के अलावा किसी अन्य भाषा का अध्ययन करने के लिए स्कूल में प्रत्येक कक्षा में कम से कम 20 छात्रों की सहमति अनिवार्य कर दी।

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पवार ने कहा, ‘‘मुख्यमंत्री ने सोमवार को इस मुद्दे पर एक बैठक बुलाई। मेरा मानना है कि हिंदी को पहली कक्षा से चौथी कक्षा तक शुरू नहीं किया जाना चाहिए। इसे पांचवीं कक्षा से शुरू किया जाना चाहिए। छात्रों को पहली कक्षा से मराठी सीखनी चाहिए और इसे धाराप्रवाह पढ़ने और लिखने में सक्षम होना चाहिए।"

उन्होंने कहा कि हालांकि कोई भी किसी विशेष भाषा को पढ़ाने के खिलाफ नहीं है, लेकिन युवा छात्रों पर शुरुआती चरण में एक अतिरिक्त भाषा का बोझ डालना अनुचित है। इस बीच, अभिनेता सयाजी शिंदे ने भी पहली कक्षा से हिंदी पढ़ाने का विरोध किया।

महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार ने कहा, ‘‘छात्रों को मराठी सीखने की अनुमति दी जानी चाहिए, जो एक बहुत ही समृद्ध भाषा है। उन्हें कम उम्र में ही मराठी में पारंगत होना चाहिए और उन पर किसी अन्य भाषा का बोझ नहीं डालना चाहिए। अगर इसे अनिवार्य बनाना ही है, तो इसे पांचवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाया जाना चाहिए।’’

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